व्रत कथा | Vrat Katha

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किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दिनभर के लिए अन्न या जल या अन्य भोजन या इन सबका त्याग व्रत कहलाता है। किसी कार्य को पूरा करने का संकल्प लेना भी व्रत कहलाता है। संकल्पपूर्वक किए गए कर्म को व्रत कहते हैं।

व्रत, धर्म का साधन माना गया है। संसार के समस्त धर्मों ने किसी न किसी रूप में व्रत और उपवास को अपनाया है। व्रत के आचरण से पापों का नाश, पुण्य का उदय, शरीर और मन की शुद्धि, अभिलषित मनोरथ की प्राप्ति और शांति तथा परम पुरुषार्थ की सिद्धि होती है। अनेक प्रकार के व्रतों में सर्वप्रथम वेद के द्वारा प्रतिपादित अग्नि की उपासना रूपी व्रत देखने में आता है। इस उपासना के पूर्व विधानपूर्वक अग्निपरिग्रह आवश्यक होता है।

कथा साहित्य की एक प्रमुख विधा है। संस्कृत साहित्य शास्त्रीय दृष्टि से विचार के पूर्व ध्यान देने की एक विचित्र बात यह है कि प्राय: समस्त चरित काव्यों में रचयिताओं द्वारा अपने काव्य का कथा के नाम से उल्लेख है। पुराने समय से प्रचलित चरित काव्य को 'कथा' कहने की प्रथा बहुत बाद तक चलती रही।

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