श्री दुर्गा सप्तशती 13 अध्याय हिंदी में (Durga Saptashati Adhyay 1 to 13 in Hindi) PDF

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श्री दुर्गा सप्तशती 13 अध्याय हिंदी में (Durga Saptashati Adhyay 1 to 13 in Hindi) - Summary

श्री दुर्गा सप्तशती (Shri Durga Saptashati), जिसे देवी माहात्म्य या चंडी पाठ भी कहा जाता है, सनातन धर्म का एक परम कल्याणकारी एवं अत्यंत प्रभावशाली धार्मिक ग्रंथ है। यह ग्रंथ हिंदू धर्म के प्रसिद्ध मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 81 से 93) का एक पावन भाग है। इसमें कुल 700 दिव्य श्लोक संकलित हैं, जिसके कारण इसे ‘सप्तशती’ कहा जाता है। ये 700 श्लोक कुल 13 अध्यायों में विभाजित हैं।

दुर्गा सप्तशती के इन 13 अध्यायों में माँ आदिशक्ति जगदम्बा के विभिन्न अवतारों, उनके असीम पराक्रम, असुरों के विनाश और देवताओं व भक्तों की रक्षा की रोमांचक कथाएं वर्णित हैं। शारदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि या गुप्त नवरात्रि के पावन दिनों में दुर्गा सप्तशती के सभी 13 अध्यायों का पाठ करने से साधक के जीवन के समस्त संकट, शत्रु बाधा, रोग और दरिद्रता का नाश होता है तथा सुख, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

दुर्गा सप्तशती के तीन प्रमुख चरित्र (Three Charitas)

श्री दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों को तीन प्रमुख चरित्रों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक चरित्र की अपनी अधिष्ठात्री देवी और तत्व है:

  1. प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय): इसकी अधिष्ठात्री देवी महाकाली हैं। इसमें भगवान विष्णु की योगनिद्रा, महामाया की स्तुति और मधु-कैटभ के वध की कथा का वर्णन है।
  2. मध्यम चरित्र (अध्याय 2 से 4): इसकी अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी हैं। इसमें देवताओं के तेज से देवी दुर्गा का प्राकट्य, महिषासुर सैन्य संहार, महिषासुर वध और देवताओं द्वारा की गई शक्रादि स्तुति सम्मिलित है।
  3. उत्तर चरित्र (अध्याय 5 से 13): इसकी अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती हैं। इसमें अपराजिता स्तुति, धूम्रलोचन वध, चण्ड-मुण्ड संहार, रक्तबीज वध, निशुम्भ एवं शुम्भ का अंत, नारायणी स्तुति तथा राजा सुरथ व समाधि वैश्य को वरदान प्राप्ति का वर्णन है।

दुर्गा सप्तशती के संपूर्ण 13 अध्याय – कथा सार एवं अर्थ (Adhyay 1 to 13 Details)

नीचे श्री दुर्गा सप्तशती के सभी 13 अध्यायों का क्रमबद्ध कथा सार और आध्यात्मिक महत्व विस्तार से प्रस्तुत किया गया है:

प्रथम अध्याय: मधु-कैटभ वध एवं महामाया की स्तुति

दुर्गा सप्तशती के प्रथम अध्याय की शुरुआत राजा सुरथ और समाधि नामक वैश्य के प्रसंग से होती है। शत्रुओं द्वारा राज्य छिन जाने पर राजा सुरथ और स्वजनों द्वारा धन हरण कर निकाल दिए गए वैश्य, दोनों मेधा ऋषि के आश्रम में पहुंचते हैं। वे ऋषि से पूछते हैं कि सब कुछ छूट जाने पर भी उनका मन ममता और मोह में क्यों फंसा है? तब मेधा ऋषि उन्हें समझाते हैं कि यह सब भगवती महामाया के प्रभाव से है। इसके बाद ऋषि भगवान विष्णु के शयनकाल में उनके कर्णमल से उत्पन्न ‘मधु’ और ‘कैटभ’ नामक दो असुरों द्वारा ब्रह्माजी पर आक्रमण तथा भगवान विष्णु द्वारा भगवती योगनिद्रा (महामाया) की कृपा से उन असुरों के वध की कथा सुनाते हैं।

द्वितीय अध्याय: देवताओं के तेज से देवी का प्राकट्य एवं महिषासुर सेना का संहार

द्वितीय अध्याय में महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता ब्रह्माजी के नेतृत्व में भगवान शिव और भगवान विष्णु के पास जाते हैं। देवताओं की व्यथा सुनकर त्रिदेवों और सभी देवताओं के मुख व शरीर से एक अपार तेज पुंज निकला, जो एकत्रित होकर परम सुन्दरी देवी दुर्गा के रूप में प्रकट हुआ। सभी देवताओं ने अपने-अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र (शिवजी ने त्रिशूल, विष्णुजी ने चक्र, वरुण ने शंख, इन्द्र ने वज्र आदि) और आभूषण देवी को भेंट किए। इसके बाद माँ दुर्गा के सिंहनाद से ब्रह्मांड कंपित हो उठा और देवी ने महिषासुर की विशाल चतुरंगिणी सेना का संहार करना शुरू किया।

तृतीय अध्याय: महिषासुर की सेना का संहार और महिषासुर वध

इस अध्याय में महिषासुर के प्रमुख सेनापतियों-चिक्षुर, चामर, उदग्र, असिलोमा, वाष्कल आदि महापराक्रमी असुरों का माँ भगवती द्वारा अंत किया जाता है। अंत में महिषासुर स्वयं भैंसे, सिंह, हाथी और पुरुष के रूप बदलकर देवी पर आक्रमण करता है। भगवती जगदम्बा अमृतपान करती हुई अट्टहास करती हैं और अपने त्रिशूल तथा चरण के प्रहार से महिषासुर की गर्दन काटकर उसका वध कर देती हैं। महिषासुर के वध से तीनों लोकों में देवताओं और ऋषियों में हर्ष छा जाता है।

चतुर्थ अध्याय: इन्द्रादि देवताओं द्वारा देवी की स्तुति (शक्रादि स्तुति)

महिषासुर के मारे जाने पर देवराज इन्द्र सहित समस्त देवता नतमस्तक होकर देवी भगवती की अत्यंत भावपूर्ण और अलौकिक स्तुति करते हैं, जिसे ‘शक्रादयः स्तुति’ कहा जाता है। देवता देवी के स्वरूप, कृपा और शक्ति की महिमा गाते हैं। प्रसन्न होकर माँ अम्बा देवताओं को वरदान देती हैं कि जब-जब देवताओं और धर्म पर संकट आएगा, वे स्वयं अवतार लेकर उनका उद्धार करेंगी।

पंचम अध्याय: देवताओं द्वारा देवी की स्तुति (अपराजिता स्तुति) एवं दूत संवाद

उत्तर चरित्र के इस अध्याय में शुम्भ और निशुम्भ नामक दो महाबली असुरों ने देवताओं को स्वर्ग से निष्कासित कर उनका अधिकार छीन लिया। सभी देवता हिमालय पर जाकर माँ जगदम्बा की आराधना करते हैं और प्रसिद्ध ‘या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः’ (अपराजिता स्तुति) करते हैं। इसी समय देवी पार्वती के शरीर कोष से ‘कौशिकी’ (महासरस्वती) प्रकट हुईं। शुम्भ-निशुम्भ के सेवक चण्ड और मुण्ड ने देवी के अनुपम सौंदर्य को देखकर अपने स्वामियों को सूचित किया। शुम्भ ने सुग्रीव नाम के दूत को प्रणय प्रस्ताव देकर देवी के पास भेजा, जिसे देवी ने कुशलतापूर्वक ठुकरा दिया और युद्ध की चुनौती दी।

षष्ठ अध्याय: धूम्रलोचन वध

जब सुग्रीव दूत असफल होकर लौटा, तो क्रोधित होकर शुम्भ ने अपने सेनापति धूम्रलोचन को 60,000 असुर सैनिकों के साथ देवी को बलपूर्वक पकड़ लाने भेजा। माँ भगवती के सामने पहुँचकर जब धूम्रलोचन ने अहंकार में गर्जना की, तो माँ अम्बे ने केवल ‘हुं’ (हुंकार) की ध्वनि से ही उसे तत्काल भस्म कर दिया। देवी के वाहन सिंह ने शेष असुर सेना का क्षण भर में विनाश कर दिया।

सप्तम अध्याय: चण्ड और मुण्ड का संहार (माँ चामुण्डा का प्राकट्य)

धूम्रलोचन के विनाश का समाचार पाकर शुम्भ ने चण्ड और मुण्ड को चतुरंगिणी सेना के साथ भेजा। जब असुरों ने देवी को चारों तरफ से घेर लिया, तो माँ कौशिकी के ललाट से अत्यंत उग्र रूप लिए, नरमुंड माला पहने, व्याघ्रचर्म धारिणी माँ कालिका प्रकट हुईं। माँ काली ने चण्ड और मुण्ड के सिर काटकर माँ कौशिकी को उपहार स्वरूप भेंट किए। इस पर प्रसन्न होकर देवी कौशिकी ने माँ काली को ‘चामुण्डा’ का नाम दिया।

अष्टम अध्याय: रक्तबीज का वध

चण्ड-मुण्ड के वध के बाद शुम्भ ने दैत्यों के सभी कुल और महाबलियों को युद्ध में झोंक दिया। इस महायुद्ध में देवी की सहायता के लिए सभी प्रमुख देवताओं की शक्तियाँ (ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, ऐन्द्री एवं शिवदूती) मातृकाओं के रूप में प्रकट हुईं। इसके बाद महाअसुर रक्तबीज युद्धभूमि में आया। उसे वरदान था कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूँदें धरती पर गिरेंगी, उतने ही शक्तिशाली नए रक्तबीज उत्पन्न हो जाएंगे। तब माँ भगवती ने चामुण्डा देवी से कहा कि वे अपना मुख फैला लें और रक्तबीज के रक्त की एक भी बूँद भूमि पर न गिरने दें। माँ चामुण्डा ने उसके रक्त का पान कर लिया और भगवती ने शस्त्रों से रक्तबीज का वध कर दिया।

नवम अध्याय: निशुम्भ का वध

रक्तबीज के मारे जाने पर शुम्भ और निशुम्भ अत्यधिक क्रोधित होकर देवी पर टूट पड़े। निशुम्भ ने अपनी प्रचंड गदा और बाणों से देवी पर वार किए। देवी ने उसके सभी अस्त्र-शस्त्र काट दिए। अंत में देवी भगवती ने अपने त्रिशूल से निशुम्भ की छाती विदीर्ण कर उसका संहार कर दिया।

दशम अध्याय: शुम्भ का वध

अपने भाई निशुम्भ के वध से विलाप करता हुआ शुम्भ देवी से कहता है कि तुम अन्य देवियों के बल पर लड़कर अहंकार कर रही हो। तब भगवती जगदम्बा कहती हैं-‘एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा’ (इस संसार में केवल मैं ही एक हूँ, मेरे सिवा दूसरी कौन है?)। इतना कहते ही समस्त मातृका शक्तियाँ देवी के शरीर में समाहित हो गईं और देवी अकेली रह गईं। इसके बाद देवी और शुम्भ के बीच भयानक द्वंद्व युद्ध हुआ। अंत में देवी ने शुम्भ को आकाश में उठाकर धरती पर पटका और शूल से उसका वध कर दिया। शुम्भ के मरते ही सृष्टि में शांति और आनंद छा गया।

एकादश अध्याय: देवताओं द्वारा नारायणी स्तुति एवं देवी का वरदान

शुम्भ और निशुम्भ के वध के पश्चात अग्निदेव और इन्द्रादि सभी देवताओं ने माँ भगवती की परम पावन नारायणी स्तुति की। इसमें प्रसिद्ध श्लोक ‘सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥’ और ‘शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥’ गाए गए। देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं को वचन दिया कि द्वापर और कलि में भी जब-जब असुर और अधर्म बढ़ेगा, वे नन्दगोप के घर यशोदा के गर्भ से, रक्तदन्तिका, शाकम्भरी, दुर्गा, भीमा और भ्रामरी के रूप में अवतार लेंगी।

द्वादश अध्याय: श्री दुर्गा सप्तशती पाठ का माहात्म्य (फलश्रुति)

इस अध्याय में स्वयं भगवती जगदम्बा दुर्गा सप्तशती पाठ के दिव्य फलों और माहात्म्य का वर्णन करती हैं। देवी कहती हैं कि जो व्यक्ति अष्टमी, चतुर्दशी, नवमी तथा नवरात्रि के दिनों में एकाग्रचित्त होकर मेरे इन तीनों चरित्रों का पाठ करेगा या सुनेगा, उसके घर में कभी दरिद्रता, गृहक्लेश, शत्रु भय या अकाल मृत्यु नहीं होगी। महामारी और विपत्तियों के समय इस पाठ का श्रवण करने से परम शांति प्राप्त होती है।

त्रयोदश अध्याय: राजा सुरथ और समाधि वैश्य को वरदान प्राप्ति

सप्तशती के अंतिम अध्याय में मेधा ऋषि का उपदेश सुनकर राजा सुरथ और समाधि वैश्य नदी के तट पर जाकर माँ भगवती की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर कठिन तपस्या करते हैं। तीन वर्ष की तपस्या के उपरांत माँ जगदम्बा प्रत्यक्ष प्रकट होकर वरदान देती हैं। राजा सुरथ को उनका खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त होता है और वे अगले जन्म में सावर्णि मनु के रूप में प्रसिद्ध होते हैं। वहीं सांसारिक मोह से मुक्त हो चुके समाधि वैश्य को परम ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती 13 अध्याय पाठ का सही क्रम (Navratri Reading Schedule)

नवरात्रि के नौ पावन दिनों में दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों को प्रतिदिन किस प्रकार पढ़ना चाहिए, इसका शास्त्रोक्त नियम नीचे तालिका में दिया गया है:

नवरात्रि दिवसतिथिपाठ किए जाने वाले अध्याय / विषय
पहला दिन (Day 1)प्रतिपदाकवच, अर्गला, कीलक, नर्वाण मंत्र एवं प्रथम अध्याय
दूसरा दिन (Day 2)द्वितीयाद्वितीय एवं तृतीय अध्याय (महिषासुर सैन्य वध)
तीसरा दिन (Day 3)तृतीयाचतुर्थ अध्याय (शक्रादि स्तुति)
चौथा दिन (Day 4)चतुर्थीपंचम, षष्ठ, सप्तम एवं अष्टम अध्याय (धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड एवं रक्तबीज वध)
पांचवां दिन (Day 5)पंचमीनवम एवं दशम अध्याय (निशुम्भ एवं शुम्भ वध)
छठा दिन (Day 6)षष्ठीएकादश अध्याय (नारायणी स्तुति)
सातवां दिन (Day 7)सप्तमीद्वादश अध्याय (फलश्रुति एवं माहात्म्य)
आठवां दिन (Day 8)अष्टमीत्रयोदश अध्याय (वरदान प्राप्ति) एवं देवी सूक्त
नौवां दिन (Day 9)नवमीसिद्धिकुंजिका स्तोत्र, क्षमा प्रार्थना, हवन एवं कन्या पूजन

दुर्गा सप्तशती पाठ की विधि और महत्वपूर्ण नियम (Durga Saptashati Path Vidhi)

  1. स्थान एवं शुद्धि: पाठ शुरू करने से पहले स्नान करके स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
  2. दीप प्रज्वलन एवं संकल्प: माँ दुर्गा की प्रतिमा या यंत्र के समक्ष शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक जलाएं। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपना नाम, गोत्र और पाठ का संकल्प लें।
  3. अंगन्यास एवं षडंग पाठ: पाठ से पूर्व शापोद्धार मंत्र, उत्कीलन मंत्र तथा कवच, अर्गला और कीलक स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए।
  4. नर्वाण मंत्र का जप: दुर्गा सप्तशती पाठ से पूर्व और पश्चात नर्वाण मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ का कम से कम 108 बार जप करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
  5. सस्वर और स्पष्ट उच्चारण: पाठ करते समय श्लोकों का उच्चारण शुद्ध, मध्यम गति और स्पष्ट वाणी में करें। बहुत तेज़ या मन ही मन फुसफुसा कर पाठ नहीं करना चाहिए।
  6. पुस्तक को हाथ में न रखें: पाठ की पोथी को कभी भी हाथ में लेकर न पढ़ें। उसे लकड़ी के पाटे (चौकी) या स्वाध्याय पीठ (रेहड़ी) पर स्वच्छ लाल वस्त्र बिछाकर रखें।
  7. क्षमा प्रार्थना: पाठ समाप्ति के उपरांत अंत में माँ भगवती से पाठ में हुई किसी भी त्रुटि या भूल-चूक के लिए क्षमा याचना अवश्य करें तथा दुर्गा जी की आरती करें।

दुर्गा सप्तशती पाठ के प्रमुख लाभ एवं फल (Benefits of Durga Saptashati)

  • शत्रु और भय से मुक्ति: दुर्गा सप्तशती का पाठ करने वाले साधक के जीवन से ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं का भय, मुकदमेबाजी और तंत्र-मंत्र के दुष्प्रभाव दूर होते हैं।
  • रोग एवं संकटों का शमन: अष्टम और एकादश अध्याय का पाठ असाध्य रोगों, शारीरिक कष्टों और महामारी से रक्षा करता है।
  • धन-धान्य और समृद्धि: मध्यम चरित्र (महालक्ष्मी स्वरूप) का नियमित पाठ करने से व्यापार में उन्नति और आर्थिक तंगी का निवारण होता है।
  • संतान और पारिवारिक सुख: गृहक्लेश दूर होता है और परिवार में शांति, सौहार्द तथा शुभ वातावरण का निर्माण होता है।
  • मोक्ष एवं आध्यात्मिक शांति: अंततः साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा का संचार होता है और उसे भगवती की परम कृपा प्राप्त होती है।

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