ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर निबंध PDF Hindi

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर निबंध Hindi PDF Download

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ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर निबंध Hindi PDF

हैलो दोस्तों, आज हम आपके लिए लेकर आये हैं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर निबंध PDF हिन्दी भाषा में। अगर आप ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर निबंध हिन्दी पीडीएफ़ डाउनलोड करना चाहते हैं तो आप बिल्कुल सही जगह आए हैं। इस लेख में हम आपको देंगे ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर निबंध के बारे में सम्पूर्ण जानकारी और पीडीएफ़ का direct डाउनलोड लिंक।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आज के दिन बहुत बड़ी समस्या बन गए है लोगों और सरकार के लिए क्योंकि प्रदूषण की समस्या आज मानव विकास की प्रक्रिया में सर्वाधिक बड़ा व्यवधान बना जा रहा है और इसका स्थायी निदान उपलब्ध नही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत प्रतिवर्ष 960 मिलियन टन अपशिष्ट उत्पन्न करता है। इसमें सबसे ज्यादा ठोस अपशिष्ट ही होता है और हमारे पास ठोस अपशिष्ट के निपटान की कोई उचित व्यवस्था भी नहीं है। इसके साथ-साथ ठोस अपशिष्ट को फेंक देने से जमीन तो खराब होती ही है, लेकिन उसको जलाने से वायु प्रदूषण भी बढ़ता है। इसीलिए हमें वर्तमान में ठोस अपशिष्ट का सही प्रबंधन करना बहोत जरूरी है।

अपशिष्ट हम सभी के लिए एक खतरनाक समस्या है। क्योकि इसकी वजह से आज हर दिन नई-नई बीमारियां फैल रही है। इन बीमारियों के कारण हर दिन लाखों लोगों की मौत हो रही है। अपशिष्ट के आंकड़ो की बात करे तो वर्तमान समय में हमारे देश में लगभग 378 मिलियन लोग शहरों में रहते है। सिर्फ ये शहरी लोग ही प्रति वर्ष 62 मिलियन टन सार्वजनिक ठोस अपशिष्ट उत्पन्न करते है। अगर हम इसमें गांव के अपशिष्ट की गणना करे तो शायद ये आंकड़े चौकाने वाले होंगे। इसमें भी विशेष रूप से ठोस अपशिष्ट (कचरा) सबसे ज्यादा खतरनाक है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर निबंध PDF

ठोस अपशिष्ट का अर्थ : साधारण भाषा में समझे तो हमारे घरो, स्कूलो, कार्यालयो, उद्योगों आदि में हम जिन कठोर चीज़ों को एक बार उपयोग करने के बाद फेंक देते है, उसे ही ठोस अपशिष्ट कहा जाता है। जैसे प्लास्टिक की वस्तुएं, कांच, धातु, चमडा, दवाई की शीशियाँ, इलेक्ट्रॉनिक सामान आदि कई ऐसे उत्पाद है, जो कई साल बीत जाने के बाद भी कभी नष्ट नहीं होते ।

बढ़ते शहरीकरण और उसके प्रभाव से निरंतर बदलती जीवनशैली ने आधुनिक समाज के सम्मुख घरेलू तथा औद्योगिक स्तर पर उत्पन्न होने वाले अपशिष्ट के उचित प्रबंधन की गंभीर चुनौती प्रस्तुत की है। वर्ष-दर-वर्ष न केवल अपशिष्ट की मात्रा में बढ़ोतरी हो रही है, बल्कि प्लास्टिक और पैकेजिंग सामग्री की बढ़ती हिस्सेदारी के साथ ठोस अपशिष्ट के स्वरूप में भी बदलाव नज़र आ रहा है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का संबंध अपशिष्ट पदार्थों के निकास से लेकर उसके उत्पादन व पुनःचक्रण द्वारा निपटान करने की देखरेख से है | अतः ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को निम्न रूप में परिभाषित किया जा सकता है : ठोस अपशिष्ट के उत्पादन का व्यवस्थित नियंत्रण, संग्रह, भंडारण, ढुलाई, निकास पृथ्थ्करण, प्रसंस्करण, उपचार, पुनः प्राप्ति और उसका निपटान | नगरपालिका अपशिष्ट पदार्थ (MSW ) शब्द का प्रायः इस्तेमाल शहर, गाँव या कस्बे के कचरे के लिए किया जाता है |

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का संबंध अपशिष्ट पदार्थों के निकास से लेकर उसके उत्पादन व पुनः चक्रण द्वारा निपटान करने की देखरेख से है| अतः ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को निम्न रूप में परिभाषित किया जा सकता है: ठोस अपशिष्ट के उत्पादन का व्यवस्थित नियंत्रण, संग्रह, भंडारण, ढुलाई, निकास पृथ्थ्करण, प्रसंस्करण, उपचार, पुनः प्राप्ति और उसका निपटान |

नगरपालिका अपशिष्ट पदार्थ (MSW ) शब्द का प्रायः इस्तेमाल शहर, गाँव या कस्बे के कचरे के लिए किया जाता है जिसमे रोज़ के कचरे को इकठ्ठा कर व उसे ढुलाई के द्वारा निपटान क्षेत्र तक पहुंचाने का काम होता है| नगरपालिका अपशिष्ट पदार्थ (MSW) के स्त्रोतों में निजी घर, वाणिज्यिक प्रतिष्ठानो और संस्थाओं के साथ साथ औद्योगिक सुविधाएं भी आती हैं |

हालांकि, MSW  औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकले कचरे, निर्माण और विध्वंस के मलबे, मल के कीचड़, खनन अपशिष्ट पदार्थों या कृषि संबंधी कचरे को अपने में शामिल नहीं करता है |नगरपालिका अपशिष्ट पदार्थों में विविध प्रकार की सामग्री आती है | इसमे खाद्य अपशिष्ट जैसे सब्जियाँ या बचा हुआ मांस, बचा हुआ खाना, अंडे के छिलके आदि ,जिसे गीला कचरा कहा जाता है ,और साथ ही साथ कागज़, प्लास्टिक, टेट्रापेक्स,प्लास्टिक के डिब्बे, अखबार, काँच की बोतलें, गत्ते के डिब्बे, एल्युमिनियम की पत्तियाँ, धातु की चीज़ें, लकड़ी के टुकड़े इत्यादि ,जिसे सूखा कचरा कहा जाता है ,जैसे अपशिष्ट पदार्थ आते हैं |

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के तरीके

मनुष्य और पर्यावरण को नुकसान करे बिना ठोस अपशिष्ट का निपटान करने की व्यवस्था को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन कहा जाता है। ठोस अपशिष्ट को प्रबंधन करने के मुख्य तरीके।

  • अपशिष्ट पुनः प्रयोग

इसमें उत्पादकों और उपभोक्ताओं को अपशिष्ट का पुनः उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इससे लोग अपने जीवन में अपशिष्ट का पुनः उपयोग करना सीखेंगे। अगर भारत के 60 प्रतिशत लोग भी इस तरीके को अपना ले तो शायद 1 साल में हम भारत में ठोस कचरे को खत्म कर सकते है।

  • अपशिष्ट का पुनः चक्रण

अपशिष्ट का पुनः चक्रण यानि कचरे को उपयोगी माल के रूप में प्रयोग करना। अगर हम ठोस अपशिष्ट को किसी उत्पाद में कच्चे माल के तौर पर उपयोग करे तो बहोत हद तक हम ठोस अपशिष्ट का निपटान कर सकते है। इसके लिए हमें सबसे पहले सारे संग्रहित कचरे को एकत्रित कर उसका कच्चा माल तैयार करना होगा और फिर उसे नए उत्पाद के लिए तैयार करना होगा।

  • भस्मीकरण

भस्मीकरण एक सामान्य तापीय प्रक्रिया है। इसमें अपशिष्ट को ओक्सीजन की उपस्थिति में दहन किया जाता है। इसके बाद अपशिष्ट पानी की भाप, कार्बनडाई ऑक्साइड और राख में बदल जाता है। इस प्रकिया का उपयोग बिजली को ऊष्मा देने के लिए भी किया जाता है। लेकिन इस प्रक्रिया से मीथेन गैस उत्पन्न होती है, जो वायु को प्रदूषित करती है। इसलिए भस्मीकरण प्रक्रिया का उपयोग थोड़ा कम किया जाता है ।

  • गैसीकरण

इस प्रक्रिया में ठोस अपशिष्ट को उच्च तापमान में विखंडित किया जाता है। इसमें अपशिष्ट का दहन बहुत कम ऑक्सीजन वाले क्षेत्रों में किया जाता है। इससे भी पर्यावरण को नुकसान होता है।

  • पाइरोलिसिस

इस प्रक्रिया में भी गैसीकरण की तरह ठोस अपशिष्ट को उच्च तापमान पर विखंडित किया जाता है। परंतु इसमें अपशिष्ट का दहन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में किया जाता है। पाइरोलिसिस की खास विशेषता यह है कि, इसमें वायु प्रदूषण बिल्कुल नहीं होता।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लाभ

  1. ठोस अपशिष्ट प्रबंधन करने से जन स्वास्थ्य और पर्यावरण इन दोनों को लाभ होता है ।
  2. जब ठोस अपशिष्ट का सही तरीके से प्रबंधन किया जाएगा तब बीमारियों के फैलने का कोई डर नहीं रहेगा। जिसकी वजह से हमारे देश के जन स्वास्थ्य में सुधार होगा और लोगो की श्रम करने की क्षमता बढ़ जाएगी।
  3. इसकी वजह से जहरीले और खतरनाक पदार्थों की निकास कम हो जाएगी, जिससे जल प्रदूषण को रोका जा सकता है।
  4. भस्मीकरण जैसी प्रक्रियाओ से हमें बिजली उत्पादन के लिए सस्ती ऊर्जा प्राप्त होगी ।
  5. अगर हम ठोस अपशिष्ट का निपटान करेंगे तो हमारी जमीने बंजर नहीं बनेगी। इससे कृषि उत्पादन की क्षमता बढ़ेगी।
  6. ठोस अपशिष्ट का पुनः चक्रण करने से हमें कच्चा माल मिलता है। इससे बनी चिजे हमें बहुत सस्ते में मिल जाएंगी।

ठोस अपशिष्ट  प्रबंधन

राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों/प्रदूषण नियंत्रण समितियों द्वारा प्रस्तुत वार्षिक रिपोर्ट 2018-19 के अनुसार देश में रोजाना कुल 1,52,076 टन ठोस कूड़ा उत्पन्न होता है। रोजाना 1,49,748 टन कूड़ा, जो कि कूड़े की कुल मात्रा का 98.5 प्रतिशत इकट्ठा किया जाता है। लेकिन केवल रोजाना 55,759 टन (35 प्रतिशत) कूड़े का उपचार किया जाता है, 50,161 टन (33 प्रतिशत) लैंडफिल में फेंक दिया जाता है और 46,156 टन यानी रोजाना उत्पन्न होने वाले कुल कूड़े के एक तिहाई का कोई हिसाब नहीं रहता।

देश में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की स्थिति का विहंगावलोकन इस प्रकार हैः

  1. 24 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में स्रोत पर ही छंटाई शुरू हुई।
  2. 22 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में यह जारी।
  3. 25 राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन सुविधा के लिए जमीन का अधिग्रहण किया।
  4. अपशिष्ट प्रसंस्करण सुविधाएँ स्थापित-2028, अपशिष्ट प्रसंस्करण शुरू-160।
  5. लैंडफिल स्थानों की पहचान-1161, संचालन शुरू हुआ-37।

अपशिष्ट प्रबंधन संबंधी चुनौतियाँ

  • शहरीकरण में तीव्रता के साथ ही ठोस अपशिष्ट उत्पादन में भी वृद्धि हुई है जिसने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को काफी हद तक बाधित किया है।
  • भारत में अधिकांश शहरी स्थानीय निकाय वित्त, बुनियादी ढाँचे और प्रौद्योगिकी की कमी के कारण कुशल अपशिष्ट प्रबंधन सेवाएँ प्रदान करने के लिये संघर्ष करते हैं।
  • हालाँकि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2016 में अपशिष्ट के अलगाव को अनिवार्य किया गया है, परंतु अक्सर बड़े पैमाने पर इस नियम का पालन नहीं किया जाता है।
  • अधिकांश नगरपालिकाएँ बिना किसी विशेष उपचार के ही ठोस अपशिष्ट को खुले डंप स्थलों पर एकत्रित करती हैं। अक्सर इस प्रकार के स्थलों से काफी बड़े पैमाने पर रोगों के जीवाणु पैदा होते हैं और आस-पास रहने वाले रोग भी इससे काफी प्रभावित होते हैं। इस प्रकार के स्थलों से जो दूषित रसायन भूजल में मिलता है वह आम लोगों के जन-जीवन को काफी नुकसान पहुँचाता है।
  • कई विशेषज्ञ इन स्थलों को वायु प्रदूषण के लिये भी ज़िम्मेदार मानते हैं।
  • एक अन्य समस्या यह है कि अपशिष्ट प्रबंधन के लिये जो वित्त आवंटित किया जाता है उसका अधिकांश हिस्सा संग्रहण और परिवहन को मिलता है, वहीं प्रसंस्करण तथा निपटान हेतु बहुत कम हिस्सा बचता है।
  • भारत में अपशिष्ट प्रबंधन क्षेत्र का गठन मुख्यतः अनौपचारिक श्रमिकों द्वारा किया जाता है जिनमें से अधिकांश शहरों में रहने वाले गरीब होते हैं। अनौपचारिक श्रमिक होने के कारण इन लोगों को कार्यात्मक और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पाती है।

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