श्री साईं चालीसा | Shri Sai Chalisa Arti PDF in Hindi

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श्री साईं चालीसा | Shri Sai Chalisa Arti in Hindi

श्री साई  चालीसा PDF हिन्दी अनुवाद सहित – शिर्डी वाले श्री साईं बाबा के बारे वैसे तो सभी लोग जानते हैं और दुनिया भर में इनके कई अनुयायी भी हैं। इनकी कृपा से कई लोगों ने जीवन के हर मोड़ पर सफलता प्राप्त की है । ये किस धर्म के थे इस पर अभी भी कई लोगों में संसय बना हुआ है कुछ लोग इन्हें हिन्दू धर्म का मानते हैं कुछ लोग इन्हें मुस्लिम । श्री साईं बाबा सभी धर्मो और जाति और समाज के लोगों को एक सामान मानते थे उनके लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं था और न ही है।

श्री साईं चालीसा

|| चौपाई ||

पहले साई के चरणों में, अपना शीश नमाऊं मैं ।

कैसे शिरडी साई आए, सारा हाल सुनाऊं मैं ॥

कौन है माता, पिता कौन है, ये न किसी ने भी जाना ।

कहां जन्म साई ने धारा, प्रश्न पहेली रहा बना ॥

कोई कहे अयोध्या के, ये रामचंद्र भगवान हैं ।

कोई कहता साई बाबा, पवन पुत्र हनुमान हैं ॥

कोई कहता मंगल मूर्ति, श्री गजानंद हैं साई ।

कोई कहता गोकुल मोहन, देवकी नन्दन हैं साई ॥

शंकर समझे भक्त कई तो, बाबा को भजते रहते ।

कोई कह अवतार दत्त का, पूजा साई की करते ॥

कुछ भी मानो उनको तुम, पर साई हैं सच्चे भगवान ।

बड़े दयालु दीनबन्धु, कितनों को दिया जीवन दान ॥

कई वर्ष पहले की घटना, तुम्हें सुनाऊंगा मैं बात ।

किसी भाग्यशाली की, शिरडी में आई थी बारात ॥

आया साथ उसी के था, बालक एक बहुत सुन्दर ।

आया, आकर वहीं बस गया, पावन शिरडी किया नगर ॥

कई दिनों तक भटकता, भिक्षा माँग उसने दर-दर ।

और दिखाई ऐसी लीला, जग में जो हो गई अमर ॥

जैसे-जैसे अमर उमर बढ़ी, बढ़ती ही वैसे गई शान ।

घर-घर होने लगा नगर में, साई बाबा का गुणगान ॥10॥

दिग्-दिगन्त में लगा गूंजने, फिर तो साईंजी का नाम ।

दीन-दुखी की रक्षा करना, यही रहा बाबा का काम ॥

बाबा के चरणों में जाकर, जो कहता मैं हूं निर्धन ।

दया उसी पर होती उनकी, खुल जाते दुःख के बंधन ॥

कभी किसी ने मांगी भिक्षा, दो बाबा मुझको संतान ।

एवं अस्तु तब कहकर साई, देते थे उसको वरदान ॥

स्वयं दुःखी बाबा हो जाते, दीन-दुःखी जन का लख हाल ।

अन्तःकरण श्री साई का, सागर जैसा रहा विशाल ॥

भक्त एक मद्रासी आया, घर का बहुत ब़ड़ा धनवान ।

माल खजाना बेहद उसका, केवल नहीं रही संतान ॥

लगा मनाने साईनाथ को, बाबा मुझ पर दया करो ।

झंझा से झंकृत नैया को, तुम्हीं मेरी पार करो ॥

कुलदीपक के बिना अंधेरा, छाया हुआ घर में मेरे ।

इसलिए आया हूँ बाबा, होकर शरणागत तेरे ॥

कुलदीपक के अभाव में, व्यर्थ है दौलत की माया ।

आज भिखारी बनकर बाबा, शरण तुम्हारी मैं आया ॥

दे दो मुझको पुत्र-दान, मैं ऋणी रहूंगा जीवन भर ।

और किसी की आशा न मुझको, सिर्फ भरोसा है तुम पर ॥

अनुनय-विनय बहुत की उसने, चरणों में धर के शीश ।

तब प्रसन्न होकर बाबा ने , दिया भक्त को यह आशीश ॥20॥

’अल्ला भला करेगा तेरा’ पुत्र जन्म हो तेरे घर ।

कृपा रहेगी तुझ पर उसकी, और तेरे उस बालक पर ॥

अब तक नहीं किसी ने पाया, साई की कृपा का पार ।

पुत्र रत्न दे मद्रासी को, धन्य किया उसका संसार ॥

तन-मन से जो भजे उसी का, जग में होता है उद्धार ।

सांच को आंच नहीं हैं कोई, सदा झूठ की होती हार ॥

मैं हूं सदा सहारे उसके, सदा रहूँगा उसका दास ।

साई जैसा प्रभु मिला है, इतनी ही कम है क्या आस ॥

मेरा भी दिन था एक ऐसा, मिलती नहीं मुझे रोटी ।

तन पर कप़ड़ा दूर रहा था, शेष रही नन्हीं सी लंगोटी ॥

सरिता सन्मुख होने पर भी, मैं प्यासा का प्यासा था ।

दुर्दिन मेरा मेरे ऊपर, दावाग्नी बरसाता था ॥

धरती के अतिरिक्त जगत में, मेरा कुछ अवलम्ब न था ।

बना भिखारी मैं दुनिया में, दर-दर ठोकर खाता था ॥

ऐसे में एक मित्र मिला जो, परम भक्त साई का था ।

जंजालों से मुक्त मगर, जगती में वह भी मुझसा था ॥

बाबा के दर्शन की खातिर, मिल दोनों ने किया विचार ।

साई जैसे दया मूर्ति के, दर्शन को हो गए तैयार ॥

पावन शिरडी नगर में जाकर, देख मतवाली मूरति ।

धन्य जन्म हो गया कि हमने, जब देखी साई की सूरति ॥30॥

जब से किए हैं दर्शन हमने, दुःख सारा काफूर हो गया ।

संकट सारे मिटै और, विपदाओं का अन्त हो गया ॥

मान और सम्मान मिला, भिक्षा में हमको बाबा से ।

प्रतिबिम्‍बित हो उठे जगत में, हम साई की आभा से ॥

बाबा ने सन्मान दिया है, मान दिया इस जीवन में ।

इसका ही संबल ले मैं, हंसता जाऊंगा जीवन में ॥

साई की लीला का मेरे, मन पर ऐसा असर हुआ ।

लगता जगती के कण-कण में, जैसे हो वह भरा हुआ ॥

’काशीराम’ बाबा का भक्त, शिरडी में रहता था ।

मैं साई का साई मेरा, वह दुनिया से कहता था ॥

सीकर स्वयं वस्त्र बेचता, ग्राम-नगर बाजारों में ।

झंकृत उसकी हृदय तंत्री थी, साई की झंकारों में ॥

स्तब्ध निशा थी, थे सोय, रजनी आंचल में चाँद सितारे ।

नहीं सूझता रहा हाथ को हाथ तिमिर के मारे ॥

वस्त्र बेचकर लौट रहा था, हाय ! हाट से काशी ।

विचित्र ब़ड़ा संयोग कि उस दिन, आता था एकाकी ॥

घेर राह में ख़ड़े हो गए, उसे कुटिल अन्यायी ।

मारो काटो लूटो इसकी ही, ध्वनि प़ड़ी सुनाई ॥

लूट पीटकर उसे वहाँ से कुटिल गए चम्पत हो ।

आघातों में मर्माहत हो, उसने दी संज्ञा खो ॥40॥

बहुत देर तक प़ड़ा रह वह, वहीं उसी हालत में ।

जाने कब कुछ होश हो उठा, वहीं उसकी पलक में ॥

अनजाने ही उसके मुंह से, निकल प़ड़ा था साई ।

जिसकी प्रतिध्वनि शिरडी में, बाबा को प़ड़ी सुनाई ॥

क्षुब्ध हो उठा मानस उनका, बाबा गए विकल हो ।

लगता जैसे घटना सारी, घटी उन्हीं के सन्मुख हो ॥

उन्मादी से इ़धर-उ़धर तब, बाबा लेगे भटकने ।

सन्मुख चीजें जो भी आई, उनको लगने पटकने ॥

और धधकते अंगारों में, बाबा ने अपना कर डाला ।

हुए सशंकित सभी वहाँ, लख ताण्डवनृत्य निराला ॥

समझ गए सब लोग, कि कोई भक्त प़ड़ा संकट में ।

क्षुभित ख़ड़े थे सभी वहाँ, पर प़ड़े हुए विस्मय में ॥

उसे बचाने की ही खातिर, बाबा आज विकल है ।

उसकी ही पी़ड़ा से पीडित, उनकी अन्तःस्थल है ॥

इतने में ही विविध ने अपनी, विचित्रता दिखलाई ।

लख कर जिसको जनता की, श्रद्धा सरिता लहराई ॥

लेकर संज्ञाहीन भक्त को, गा़ड़ी एक वहाँ आई ।

सन्मुख अपने देख भक्त को, साई की आंखें भर आई ॥

शांत, धीर, गंभीर, सिन्धु सा, बाबा का अन्तःस्थल ।

आज न जाने क्यों रह-रहकर, हो जाता था चंचल ॥50॥

आज दया की मूर्ति स्वयं था, बना हुआ उपचारी ।

और भक्त के लिए आज था, देव बना प्रतिहारी ॥

आज भक्ति की विषम परीक्षा में, सफल हुआ था काशी ।

उसके ही दर्शन की खातिर थे, उम़ड़े नगर-निवासी ॥

जब भी और जहां भी कोई, भक्त प़ड़े संकट में ।

उसकी रक्षा करने बाबा, आते हैं पलभर में ॥

साईं बाबा की पूजा-अर्चना / पूजा विधि इस प्रकार है :-

  • गुरुवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें। फिर नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि करें। फिर साईं बाबा का ध्यान करें। व्रत का संकल्प लें।
  • इसके बाद उनकी मूर्ति या तस्वीर को स्थापित करें। इस पर गंगाजल छिड़कें। मूर्ति पर पीला कपड़ा चढ़ाएं।
  • साईं बाबा पर पुष्प, रोली और अक्षत अर्पित करें। धूप, घी से साईं बाबा की आरती उतारें।
  • फिर पीले फूल अर्पित करें और अक्षत व पीले फूल हाथ में रखकर उनकी कथा सुनें।
  • साईं बाबा को पीली मिठाई जैसे लड्डू का भोग लगाएं। फिर सभी प्रसाद बांट दें। अपने सार्म्थय के अनुसार दान भी दें।

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